‘वैक्सीन मैत्री’ का ग्लोबल भौकाल: जब इंडिया बना 101 देशों के लिए असली ‘संजीवनी’
Tags: Vaccine Maitri: How India Became the "Pharmacy of the World" During a Global Crisisज़रा इमेजिन कीजिए… साल 2020 का वो खौफनाक दौर। पूरी दुनिया में लॉकडाउन (Lockdown) लगा हुआ है, इकॉनमी क्रैश हो चुकी है, और हर रोज़ न्यूज़ चैनल्स पर सिर्फ मौतों का डेटा दिखाया जा रहा है। पूरी इंसानियत सिर्फ एक ही चीज़ का इंतज़ार कर रही थी— एक वैक्सीन (Vaccine)।
महीनों की रिसर्च के बाद, फाइनली जब वैक्सीन बनी, तो दुनिया को एक नई और बहुत ही घिनौनी सच्चाई का सामना करना पड़ा। इस सच्चाई को इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में ‘Vaccine Nationalism’ (वैक्सीन राष्ट्रवाद) कहा जाता है। दुनिया के अमीर देशों ने अपनी दौलत की पावर से सारी वैक्सीन्स को पहले ही खरीद कर ‘होर्ड’ (hoard – जमाखोरी) कर लिया।
लेकिन इसी डार्क टाइम में एक देश ऐसा था जिसने “वसुधैव कुटुम्बकम” (पूरी दुनिया एक परिवार है) की फिलॉसफी को सिर्फ कागज़ों पर नहीं, बल्कि ग्राउंड लेवल पर सॉलिड डेटा के साथ साबित किया। उस देश ने ना सिर्फ अपने 140 करोड़ लोगों को वैक्सीनेट किया, बल्कि दुनिया के 100 से ज़्यादा देशों की जान भी बचाई।
द ग्लोबल क्राइसिस: ‘वैक्सीन नेशनलिज़्म’ का डरावना डेटा
इंडिया के एक्शन को समझने के लिए पहले हमें वेस्टर्न कंट्रीज़ (Western Countries) के सेल्फिश बिहेवियर का डेटा देखना होगा।
जब वैक्सीन बननी शुरू हुई, तो दुनिया की सिर्फ 16% आबादी वाले अमीर देशों ने ग्लोबल वैक्सीन सप्लाई का 60% हिस्सा एडवांस में ही बुक कर लिया था।
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कनाडा (Canada): इस देश ने अपनी टोटल पॉपुलेशन से 9 गुना ज़्यादा वैक्सीन डोज़ प्री-ऑर्डर कर ली थीं।
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ब्रिटेन (UK): इन्होंने अपनी आबादी से 6 गुना ज़्यादा डोज़ बुक कर ली थीं।
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अमेरिका और यूरोपियन यूनियन (US & EU): इन्होंने भी अपनी ज़रूरत से कई गुना ज़्यादा सप्लाई को ब्लॉक कर दिया था।
रिज़ल्ट क्या हुआ? अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और एशिया के गरीब देशों के पास कोई वैक्सीन नहीं बची। उनके पास ना तो फाइज़र (Pfizer) और मॉडर्ना (Moderna) को देने के लिए अरबों डॉलर्स थे, और ना ही कोई उम्मीद। WHO (वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन) भी इस ग्लोबल जमाखोरी के सामने बेबस था।
20 जनवरी 2021: ‘वैक्सीन मैत्री’ का शंखनाद
यहीं पर एंट्री होती है इंडिया की। 16 जनवरी 2021 को इंडिया ने अपना खुद का नेशनल वैक्सीनेशन प्रोग्राम लॉन्च किया था (जिसमें ‘Covishield’ और ‘Covaxin’ का यूज़ हो रहा था)।
इसके ठीक 4 दिन बाद, यानी 20 जनवरी 2021 को, इंडियन गवर्नमेंट ने एक हिस्टोरिकल डिसीजन लिया और ‘वैक्सीन मैत्री’ इनिशिएटिव लॉन्च कर दिया। इसका सिंपल मतलब था— “हम सिर्फ खुद को नहीं बचाएंगे, हम अपने पड़ोसियों और दुनिया के हर उस देश को वैक्सीन देंगे जिसे इसकी ज़रूरत है।”
सबसे पहली फ्लाइट्स (ग्रांट्स यानी बिलकुल फ्री ऑफ कॉस्ट) हमारे पड़ोसियों के लिए उड़ीं:
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भूटान (Bhutan) को 1.5 लाख डोज़।
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मालदीव (Maldives) को 1 लाख डोज़।
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नेपाल (Nepal) को 10 लाख डोज़।
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बांग्लादेश (Bangladesh) को 20 लाख डोज़।
द हार्ड फैक्ट्स: इंडिया का एक्सपोर्ट डेटा क्या कहता है?
अगर हम डेटा की बात करें, तो इंडिया का वैक्सीन एक्सपोर्ट दुनिया के किसी भी देश के लिए एक इम्पॉसिबल टास्क था। गवर्नमेंट के ऑफिशियल डेटा (मई 2023 तक) के मुताबिक, इंडिया ने दुनिया के 101 देशों को लगभग 30 करोड़ (298 Million) वैक्सीन डोज़ सप्लाई कीं।
इस 30 करोड़ के डेटा को अगर हम ब्रेकडाउन (Breakdown) करें, तो इसके तीन मेन पिलर्स थे:
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ग्रांट्स (Grants – बिल्कुल फ्री): लगभग 1.5 करोड़ (15 Million) डोज़ इंडिया ने गरीब और पड़ोसी देशों को एकदम मुफ्त में दीं (As a gift)।
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कमर्शियल सप्लाई (Commercial): लगभग 23 करोड़ (230 Million) डोज़ दूसरे देशों को बहुत ही अफोर्डेबल मार्केट रेट्स पर बेची गईं। यहाँ तक कि जब ब्रिटेन (UK) और कनाडा (Canada) में वैक्सीन की शॉर्टेज हो गई, तो उन्होंने भी इंडिया से ही कमर्शियल डोज़ खरीदीं!
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कोवैक्स (COVAX फैसिलिटी): WHO का एक प्रोग्राम था ‘COVAX’, जिसका काम था गरीब देशों को वैक्सीन देना। इंडिया ने इस ग्लोबल एलायंस को लगभग 5.2 करोड़ (52 Million) डोज़ की सप्लाई दी।
टॉप बेनेफिशियरी (Top Beneficiary): इस पूरे मिशन में सबसे ज़्यादा वैक्सीन बांग्लादेश को मिलीं (लगभग 1 करोड़ से ज़्यादा डोज़), उसके बाद म्यांमार (Myanmar) और नेपाल का नंबर था।
कॉस्ट और कोल्ड-चेन: दुनिया इंडिया पर ही डिपेंडेंट क्यों थी?
अब आपके दिमाग में एक सवाल आ सकता है कि पूरी दुनिया इंडिया के ही पास क्यों आ रही थी? अमेरिका के पास क्यों नहीं गई? इसके पीछे दो बहुत तगड़े साइंटिफिक और इकॉनोमिक रीज़न्स थे:
1. द प्राइस डिफ़रेंस (The Economics): अमेरिका की फाइज़र (Pfizer) और मॉडर्ना (Moderna) वैक्सीन्स की कीमत लगभग $12 से $15 (लगभग 1000-1200 रुपये) पर डोज़ थी। अफ्रीका का कोई भी गरीब देश इसे अफोर्ड नहीं कर सकता था। वहीं दूसरी तरफ, इंडिया की सीरम इंस्टिट्यूट (Serum Institute of India – SII) द्वारा बनाई गई कोविशील्ड (Covishield) की कीमत सिर्फ $3 (लगभग 225 रुपये) पर डोज़ थी। क्वालिटी एकदम वर्ल्ड-क्लास, लेकिन कीमत अमेरिका से 4 से 5 गुना कम!
2. द ‘कोल्ड चेन’ प्रॉब्लम (The Logistics): अमेरिका की फाइज़र वैक्सीन को स्टोर करने के लिए -70 डिग्री सेल्सियस (-70°C) के अल्ट्रा-कोल्ड फ्रीज़र्स की ज़रूरत होती है। अब सोचिए, केन्या (Kenya), सूडान या नाइजीरिया जैसे देशों के गाँवों में जहाँ नॉर्मल बिजली नहीं आती, वहाँ -70°C का फ्रीज़र कहाँ से आएगा? यहीं पर इंडिया की वैक्सीन्स ने गेम पलट दिया। कोविशील्ड और कोवैक्सीन दोनों को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस (यानी हमारे घर के नॉर्मल फ्रिज के टेम्परेचर) पर स्टोर किया जा सकता था। इसी लॉजिस्टिक मैजिक की वजह से इंडियन वैक्सीन्स दुनिया के सबसे रिमोट (remote) जंगलों और पहाड़ों तक पहुँच पाईं।
डिड यू नो? (Did You Know?) इंडिया ने दुनिया के अलग-अलग देशों में पीसकीपिंग (Peacekeeping) का काम कर रही UN (United Nations) की मिलिट्री फोर्सेज को भी 2 लाख वैक्सीन डोज़ बिल्कुल फ्री में गिफ्ट की थीं। इसके लिए खुद UN के सेक्रेटरी-जनरल ने इंडिया को ऑफिशियली थैंक्स बोला था।
द जियोपॉलिटिकल इम्पैक्ट: सॉफ्ट पावर का सबसे बड़ा ROI
‘वैक्सीन मैत्री’ कोई चैरिटी नहीं थी; इंटरनेशनल रिलेशंस (IR) की भाषा में यह इंडिया का अब तक का सबसे तगड़ा ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) प्रोजेक्शन था।
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ब्राज़ील का रिएक्शन: जब इंडिया ने ब्राज़ील को वैक्सीन की कमर्शियल सप्लाई भेजी, तो वहाँ के तत्कालीन प्रेसिडेंट (Jair Bolsonaro) ने ट्विटर पर भगवान हनुमान की एक फोटो पोस्ट की, जिसमें हनुमान जी भारत से ‘संजीवनी बूटी’ लेकर ब्राज़ील आ रहे हैं। यह इंडिया के कल्चरल और डिप्लोमैटिक इन्फ्लुएंस की बहुत बड़ी जीत थी।
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कैरेबियन देशों का सपोर्ट: जमैका (Jamaica), डोमिनिका (Dominica) और बारबाडोस जैसे छोटे कैरेबियन देशों को दुनिया के किसी सुपरपावर ने नहीं पूछा, तब इंडिया ने उनके लिए स्पेशल चार्टर्ड फ्लाइट्स से वैक्सीन्स भेजीं। इसके बदले में इन देशों ने इंटरनेशनल फोरम्स पर इंडिया के स्टैंड को खुलकर सपोर्ट करना शुरू कर दिया।
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चाइना को काउंटर (Countering China): चाइना अपनी ‘Sinopharm’ वैक्सीन के ज़रिए साउथ एशिया (नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश) पर कंट्रोल करना चाहता था। लेकिन इंडिया ने अपने सुपीरियर डेटा और फास्ट डिलीवरी से चाइना की ‘वैक्सीन डिप्लोमेसी’ को पूरी तरह से फेल कर दिया।
(नोट: एक फैक्चुअल बात यह भी है कि अप्रैल 2021 में जब इंडिया में COVID की खतरनाक सेकंड वेव (Delta wave) आई थी, तब गवर्नमेंट ने कुछ महीनों के लिए एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी थी ताकि देश की जनता को बचाया जा सके। लेकिन जैसे ही प्रोडक्शन बढ़ा, अक्टूबर 2021 से इंडिया ने फिर से ग्लोबल सप्लाई शुरू कर दी और अपने सारे कमिटमेंट्स पूरे किए।)
आज के स्टूडेंट्स के लिए सबसे बड़ा लेसन (The Bottom Line)
‘वैक्सीन मैत्री’ आज के यूथ, स्टूडेंट्स और फ्यूचर लीडर्स के लिए एक बहुत बड़ी केस स्टडी है। यह हमें सिखाता है कि ‘ग्लोबल लीडरशिप’ (Global Leadership) सिर्फ इस बात से नहीं आती कि आपके पास कितनी बड़ी आर्मी है या आपका GDP कितना ट्रिलियन डॉलर का है। असली लीडरशिप इस बात से आती है कि जब पूरी दुनिया क्राइसिस में हो, तब आप अपनी टेक्नोलॉजी, डेटा और मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी का इस्तेमाल दूसरों को बचाने के लिए कैसे करते हैं।
आज जब दुनिया इंडिया को “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” कहती है, तो वो कोई मार्केटिंग स्लोगन (slogan) नहीं है; वो 101 देशों की जान बचाने का एक सॉलिड, डेटा-बैक्ड ट्रैक रिकॉर्ड है!