कैसे RTI ने आम आदमी को बनाया सिस्टम का बॉस

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The Right to Information (RTI) Act: The Law That Placed Power Back in the Citizen’s Hands

 10 रुपये का ‘ब्रह्मास्त्र’: कैसे RTI ने आम आदमी को बनाया सिस्टम का बॉस

ज़रा इमेजिन कीजिए… आपके मोहल्ले की सड़क पिछले 5 सालों से टूटी पड़ी है। आप म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (नगर निगम) के ऑफिस जाते हैं और वहां बैठे ‘सरकारी बाबू’ से पूछते हैं, “सर, इस सड़क को बनाने का जो टेंडर पास हुआ था, उसका पैसा कहाँ गया?”

अगर ये बात आप 2005 से पहले पूछ रहे होते, तो वो ऑफिसर आपको ऊपर से नीचे तक देखता और सीधा बोलता— “ये सरकारी फाइल है, कॉन्फिडेंशियल (Confidential) है। तुम कौन हो पूछने वाले? बाहर जाओ!” 2005 से पहले का इंडिया बिल्कुल ऐसा ही था। गवर्नमेंट के पास अंग्रेजों के ज़माने का एक बहुत ही खतरनाक कानून था जिसका नाम था ‘Official Secrets Act, 1923’ इस कानून का सीधा सा मतलब था कि सरकार जो भी काम कर रही है, वो एक ‘सीक्रेट’ है और आम पब्लिक को सवाल पूछने का कोई हक नहीं है। गवर्नमेंट काम पब्लिक के टैक्स के पैसे से करती थी, लेकिन पब्लिक को ही हिसाब नहीं देती थी।

लेकिन फिर साल 2005 में पार्लियामेंट से एक ऐसा कानून पास हुआ, जिसने इस पूरे ‘वीआईपी (VIP) सिस्टम’ की धज्जियां उड़ा दीं। एक ऐसा कानून जिसने देश के हर एक आम नागरिक, स्टूडेंट और किसान के हाथ में एक 10 रुपये का ‘ब्रह्मास्त्र’ थमा दिया। इस मास्टरस्ट्रोक का नाम है— RTI (Right to Information) Act यानी सूचना का अधिकार।

चूंकि हमारा रूल अब एकदम क्लियर है कि हमें हवा-हवाई बातें नहीं करनी हैं, तो चलिए इस 1200+ वर्ड्स के डीप-डाइव और डेटा-ड्रिवन आर्टिकल में इस ‘RTI रेवोल्यूशन’ का पूरा पोस्टमॉर्टम करते हैं।


द फ्लैशबैक: एक छोटे से गाँव से शुरू हुई बगावत (The MKSS Movement)

RTI कोई ऐसा कानून नहीं है जो अचानक से दिल्ली के किसी एसी (AC) कमरे में बैठे मिनिस्टर्स के दिमाग में आ गया हो। इस कानून की असली पैदाइश राजस्थान के एक छोटे से गाँव से हुई थी।

1990s के दशक में, राजस्थान के राजसमंद और अजमेर ज़िलों में गवर्नमेंट ने सूखा-राहत (drought relief) के लिए कई सारे काम शुरू किए थे। गाँव के मज़दूर दिन-रात काम करते थे, लेकिन जब उन्हें पैसे मिलने की बारी आती थी, तो कॉन्ट्रैक्टर कहता था, “तुम्हारा नाम रजिस्टर में नहीं है” या “तुमने आधा ही काम किया है।” सारा पैसा करप्शन में जा रहा था।

तब अरुणा रॉय (Aruna Roy) और निखिल डे जैसे सोशल एक्टिविस्ट्स ने मिलकर एक संगठन बनाया— MKSS (मज़दूर किसान शक्ति संगठन)

उन्होंने गवर्नमेंट से बस एक ही चीज़ मांगी— “हमें वो मस्टर रोल (Attendance Register) और बिल दिखाओ जिसमें लिखा है कि पैसा किसे दिया गया है।” जब गवर्नमेंट ने मना किया, तो इन लोगों ने 40 दिन तक लगातार हड़ताल की। उनकी एक ही डिमांड थी: “हमारा पैसा, हमारा हिसाब!” यह मूवमेंट इतना बड़ा हो गया कि इसने पूरे देश का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया। सालों के प्रेशर, धरने और पब्लिक डिमांड के बाद, फाइनली 12 अक्टूबर 2005 को पूरे इंडिया में RTI Act लागू कर दिया गया।


द मैकेनिक्स: ये ’10 रुपये का मैजिक’ काम कैसे करता है?

RTI एक्ट की सबसे बड़ी खूबसूरती इसका सिंपल और फास्ट होना है। इसे वकीलों या अमीरों के लिए नहीं, बल्कि एकदम ‘आम आदमी’ के लिए डिज़ाइन किया गया है।

अगर आपको गवर्नमेंट के किसी भी डिपार्टमेंट (PMO से लेकर आपके गाँव की पंचायत तक) से कोई भी इंफॉर्मेशन चाहिए, तो उसका प्रोसेस ये है:

  • सिर्फ 10 रुपये की फीस: आपको एक सादे कागज़ पर अपनी एप्लीकेशन लिखनी है (या ऑनलाइन पोर्टल पर टाइप करनी है) और उसके साथ सिर्फ ₹10 का पोस्टल आर्डर या ऑनलाइन पेमेंट करना है। अगर कोई BPL (Below Poverty Line – गरीबी रेखा से नीचे) कार्ड होल्डर है, तो उसके लिए ये ₹10 भी पूरी तरह से फ्री हैं।

  • PIO (Public Information Officer): हर सरकारी ऑफिस में एक ऑफिसर की ड्यूटी फिक्स कर दी गई है जिसे PIO कहते हैं। उसका सिर्फ एक ही काम है—पब्लिक की RTI एप्लीकेशन को रिसीव करना और उन्हें जवाब देना।

  • 30 दिन की डेडलाइन (The 30-Day Rule): यह इस कानून का सबसे तगड़ा पार्ट है। PIO को किसी भी हालत में आपकी एप्लीकेशन का जवाब 30 दिनों के अंदर देना ही होगा।

  • लाइफ एंड लिबर्टी क्लॉज़ (48 Hours Rule): अगर आपकी मांगी गई जानकारी किसी इंसान की ज़िंदगी या आज़ादी से जुड़ी है (जैसे पुलिस ने किसी को इललीगल तरीके से अरेस्ट कर लिया है), तो डिपार्टमेंट को 30 दिन नहीं, बल्कि सिर्फ 48 घंटे के अंदर जवाब देना पड़ता है।

लेकिन अगर बाबू ने जवाब नहीं दिया तो? (द पेनाल्टी सिस्टम)

गवर्नमेंट जानती थी कि सरकारी बाबू आसानी से काम नहीं करेंगे। इसलिए RTI में एक बहुत भारी पेनाल्टी (Penalty) सिस्टम डाला गया।

अगर PIO 30 दिन में जवाब नहीं देता है, या जानबूझकर गलत जानकारी देता है, तो उस ऑफिसर की पर्सनल सैलरी में से ₹250 हर दिन के हिसाब से फाइन काटा जाएगा (जो मैक्सिमम ₹25,000 तक हो सकता है)। यही वो डर है जिसकी वजह से आज सरकारी फाइल्स तेज़ी से मूव होती हैं।


द इम्पैक्ट (The ROI): डेटा क्या कहता है?

अब आते हैं हार्ड फैक्ट्स और नंबर्स पर। क्या 2005 से लेकर आज तक RTI ने सच में ग्राउंड लेवल पर कोई बदलाव किया है? डेटा देखकर आपका दिमाग हिल जाएगा।

1. द वॉल्यूम (क्रेज़ी नंबर्स):

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (CHRI) और अन्य इंडिपेंडेंट रिपोर्ट्स के डेटा के मुताबिक, 2005 से लेकर अब तक इंडिया में लगभग 4 करोड़ से 5 करोड़ (40-50 Million) RTI एप्लीकेशन्स फाइल की जा चुकी हैं।

हर साल इंडिया में लगभग 40 से 60 लाख नई RTI लगाई जाती हैं। इंडिया दुनिया का इकलौता देश है जहाँ इस लेवल पर सिटिज़न (citizen) और गवर्नमेंट के बीच सवाल-जवाब का वॉल्यूम इतना बड़ा है।

2. देश के सबसे बड़े स्कैम्स (Scams) का पर्दाफाश:

RTI सिर्फ मोहल्ले की सड़क तक लिमिटेड नहीं रही; इसने देश की पॉलिटिक्स की जड़ें हिला दीं।

  • आदर्श हाउसिंग सोसाइटी स्कैम (2010): मुंबई की एक प्राइम लोकेशन पर 31 मंज़िला ‘आदर्श सोसाइटी’ बनी थी। रूल के हिसाब से ये फ्लैट्स कारगिल युद्ध (Kargil War) के शहीदों की विधवाओं (widows) और आर्मी के लोगों के लिए थे। लेकिन सिमरप्रीत सिंह नाम के एक एक्टिविस्ट ने RTI लगाई। और जो डेटा निकल कर आया, उसने पूरे देश में आग लगा दी। पता चला कि वो सारे फ्लैट्स उस वक्त के चीफ मिनिस्टर के रिश्तेदारों, टॉप ब्यूरोक्रेट्स और पॉलिटिशियंस ने कौड़ियों के भाव अपने नाम कर लिए थे। इस एक RTI की वजह से महाराष्ट्र के तत्कालीन चीफ मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ा था।

  • कॉमनवेल्थ गेम्स स्कैम (CWG 2010): दिल्ली में हुए CWG गेम्स में करोड़ों का करप्शन हुआ था। एक RTI से खुलासा हुआ कि गवर्नमेंट ने एक नॉर्मल टॉयलेट पेपर रोल (जो 10-20 रुपये का आता है) के लिए 3000 रुपये से ज़्यादा का पेमेंट किया था! टेंट और ट्रेडमिल रेंट पर लेने के लिए भी मार्केट रेट से 10 गुना ज़्यादा पैसे दिए गए थे।

3. द माइक्रो-इम्पैक्ट (आम आदमी की जीत):

स्कैम्स तो बहुत बड़ी बात हो गई, असली मैजिक तो आम लोगों की लाइफ में हुआ।

  • एक स्टूडेंट ने अपने बोर्ड एग्जाम की आंसर-शीट (Answer sheet) चेक करने के लिए RTI लगाई, और पता चला कि उसके मार्क्स गलत जोड़े गए थे।

  • हज़ारों बुजुर्गों (Senior Citizens) को उनकी अटकी हुई पेंशन सिर्फ इसलिए मिल गई क्योंकि उन्होंने PF ऑफिस में एक RTI लगाकर पूछ लिया कि “मेरी फाइल किस टेबल पर और किसके पास रुकी हुई है?” बाबू ने पेनाल्टी के डर से अगले ही दिन पेंशन रिलीज़ कर दी।

  • गाँव के लोगों ने राशन की दुकान वाले की पोल खोल दी, जो कहता था कि “पीछे से राशन नहीं आया”, जबकि RTI से पता चला कि उसका पूरा कोटा गवर्नमेंट की तरफ से डिलीवर हो चुका था।


द एक्सेप्शंस: आप क्या ‘नहीं’ पूछ सकते? (Section 8)

अब ऐसा भी नहीं है कि आप RTI लगाकर कुछ भी पूछ लें। कल को आप जाकर पूछें कि “इंडियन आर्मी के न्यूक्लियर वेपन के पासवर्ड्स क्या हैं?” तो वो आपको नहीं मिलेंगे!

RTI एक्ट के सेक्शन 8 (Section 8) में कुछ एक्सेप्शंस (छूट) दिए गए हैं। आप वो जानकारी नहीं मांग सकते जो:

 

  1. देश की सिक्योरिटी, डिफेन्स या फॉरेन रिलेशन (National Security) के लिए खतरा हो।

  2. किसी व्यक्ति की बेहद पर्सनल जानकारी हो (जैसे किसी की मेडिकल रिपोर्ट या बैंक डिटेल्स), जिसका पब्लिक इंट्रेस्ट से कोई लेना-देना ना हो।

  3. वो कॉन्फिडेंशियल जानकारी जो कैबिनेट मिनिस्टर्स की सीक्रेट मीटिंग्स में डिस्कस हो रही हो।

इन कुछ लॉजिकल पॉइंट्स को छोड़कर, गवर्नमेंट का हर डेटा—चाहे वो टेंडर हो, कॉन्ट्रैक्ट हो, सैलरी हो, या खर्चों का बिल हो—सब कुछ पब्लिक डोमेन में है।


आज के स्टूडेंट्स के लिए सबसे बड़ा लेसन (The Bottom Line)

RTI कोई स्कूल की ‘सिविक्स’ (Civics) की किताब का बोरिंग चैप्टर नहीं है। यह ‘अकाउंटेबिलिटी’ (Accountability – जवाबदेही) का सबसे प्रैक्टिकल टूल है।

आज़ादी के बाद सालों तक इंडियंस को लगता था कि सरकार ‘माई-बाप’ (Mai-Baap) है और हम सिर्फ उनके नौकर या प्रजा हैं। लेकिन 2005 के RTI एक्ट ने इस माइंडसेट को पूरी तरह से रिवर्स कर दिया। इसने हर सिटिज़न को याद दिलाया कि— “आप टैक्सपेयर हैं। सरकार आपकी नौकर है, और आपके पास अपने एक-एक पैसे का हिसाब मांगने का पूरा लीगल राइट है।”

जब तक देश का यूथ, स्टूडेंट्स और आम नागरिक इस 10 रुपये के ब्रह्मास्त्र का यूज़ करते रहेंगे, तब तक कोई भी सिस्टम अपनी पावर का गलत इस्तेमाल करने से पहले 10 बार सोचेगा।

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