मिड-डे मील: वो मास्टरस्ट्रोक जिसने 12 करोड़ बच्चों को ‘चाय की टपरी’ से निकालकर स्कूल पहुँचाया
Tags: The Mid-Day Meal Scheme: The Masterstroke That Brought Millions of Children to Schoolइमेजिन कीजिए… सुबह के 8 बज रहे हैं। एक 8 साल का बच्चा सड़क किनारे एक ढाबे पर बर्तन धो रहा है। आप उससे पूछते हैं, “बेटा, तुम स्कूल क्यों नहीं जाते?” वो एक बहुत ही सीधा लेकिन दिल तोड़ने वाला जवाब देता है— “बाबूजी, स्कूल जाऊंगा तो कमाऊंगा कैसे? और कमाऊंगा नहीं, तो खाऊंगा क्या?”
कई दशकों तक इंडिया के लाखों गरीब बच्चों की यही कड़वी सच्चाई थी। गवर्नमेंट ने सरकारी स्कूल तो खोल दिए थे, एजुकेशन भी फ्री कर दी थी, लेकिन एक बहुत बड़ा लॉजिक मिसिंग था— खाली पेट पढ़ाई नहीं होती। एक गरीब दिहाड़ी मज़दूर के लिए अपने बच्चे को स्कूल भेजना एक ‘लॉस-मेकिंग डील’ (Loss-making deal) थी। अगर बच्चा स्कूल जाएगा, तो वो दिन के 50 रुपये कैसे कमाएगा जो घर का राशन लाते हैं?
देश को एक ऐसे ‘हैक’ (Hack) की ज़रूरत थी जो इस मज़बूरी को तोड़ सके। और यहीं जन्म हुआ दुनिया के सबसे बड़े, सबसे इम्पैक्टफुल और सबसे ज़्यादा डेटा-ड्रिवन सोशल प्रोग्राम का— मिड-डे मील स्कीम (Mid-Day Meal Scheme)।
चलिए समझते हैं कि कैसे एक वक्त की ‘फ्री रोटी’ ने इंडिया के एजुकेशन सिस्टम का पूरा नक्शा पलट कर रख दिया।
द फ्लैशबैक: एक चीफ मिनिस्टर का मास्टरमाइंड विज़न
ज़्यादातर लोगों को लगता है कि यह स्कीम दिल्ली में बैठे किसी बड़े ब्यूरोक्रेट के दिमाग की उपज है। लेकिन इसकी असली कहानी शुरू होती है 1950 और 60 के दशक के मद्रास (आज का तमिलनाडु) से।
उस वक्त तमिलनाडु के चीफ मिनिस्टर थे के. कामराज (K. Kamaraj)। एक दिन वो अपनी कार से कहीं जा रहे थे और रेलवे क्रॉसिंग पर रुके। उन्होंने देखा कि कुछ बच्चे गाय-भैंस चरा रहे हैं। कामराज गाड़ी से उतरे और एक बच्चे से पूछा, “तुम स्कूल क्यों नहीं गए?” बच्चे ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, “अगर मैं स्कूल जाऊंगा, तो क्या तुम मुझे वहां खाना दोगे?”
इस एक सवाल ने कामराज के दिमाग की बत्ती जला दी। उन्होंने समझ लिया कि एजुकेशन और भूख का सीधा कनेक्शन है। 1956 में उन्होंने पूरे स्टेट में स्कूल के बच्चों के लिए ‘फ्री लंच’ की स्कीम लागू कर दी। बाद में 1982 में M.G. Ramachandran (MGR) ने इस स्कीम को और बड़ा कर दिया। रिज़ल्ट? तमिलनाडु का लिटरेसी रेट (Literacy rate) रॉकेट की तरह ऊपर भागने लगा।
द टर्निंग पॉइंट: 2001 का वो ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट आर्डर
तमिलनाडु का मॉडल हिट था, लेकिन बाकी इंडिया अभी भी सो रहा था। साल 2001 आते-आते सिचुएशन बहुत अजीब और शर्मनाक हो गई थी।
एक तरफ FCI (Food Corporation of India) के गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ रहा था। अनाज इतना ज़्यादा था कि उसे रखने की जगह नहीं थी और उसे चूहे खा रहे थे। और दूसरी तरफ, राजस्थान और उड़ीसा जैसे राज्यों में भयंकर सूखा (Drought) पड़ा था और बच्चे कुपोषण (Malnutrition) से मर रहे थे।
इस सिस्टम के खिलाफ PUCL (People’s Union for Civil Liberties) नाम के एक NGO ने सुप्रीम कोर्ट में एक PIL (Public Interest Litigation) फाइल कर दी। उनकी डिमांड सिंपल थी: “गोदामों में जो अनाज चूहों के लिए पड़ा है, वो भूखे इंसानों का है।”
28 नवंबर 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा जजमेंट दिया जिसने इतिहास रच दिया। कोर्ट ने देश के सभी राज्यों को कड़क आर्डर दिया— “हर सरकारी और गवर्नमेंट-एडेड स्कूल में बच्चों को सिर्फ सूखा राशन नहीं, बल्कि कम से कम 300 कैलोरी और 8-12 ग्राम प्रोटीन वाला पका हुआ गरम खाना (Cooked Meal) मिलना ही चाहिए।”
यहीं से ‘मिड-डे मील’ ऑफिशियली एक नेशनल पॉलिसी बन गई।
द स्केल: ये प्रोजेक्ट आखिर कितना बड़ा है? (The Mind-Blowing Data)
जब आप मिड-डे मील (जिसका नया नाम अब PM POSHAN हो गया है) का रियल डेटा देखते हैं, तो किसी भी बड़े मल्टीनेशनल कॉर्पोरेशन (MNC) का लॉजिस्टिक्स इसके सामने छोटा लगने लगता है।
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कवरेज: आज यह प्रोग्राम पूरे इंडिया के लगभग 11.20 लाख (1.12 Million) स्कूलों में चल रहा है।
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बेनेफिशियरीज: हर रोज़ लगभग 11.8 करोड़ से 12 करोड़ (118-120 Million) बच्चों को इस स्कीम के तहत एकदम फ्री, गरम और पौष्टिक खाना मिलता है।
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ग्लोबल कम्पैरिज़न: ये नंबर इतना बड़ा है कि अगर आप अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के सारे बच्चों को एक साथ मिला लें, तो भी इंडिया रोज़ उससे ज़्यादा बच्चों को स्कूल में खाना खिला रहा है!
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बजट: इस पूरे इकोसिस्टम को चलाने के लिए गवर्नमेंट हर साल लगभग ₹10,000 से ₹11,000 करोड़ का बजट पास करती है।
द असली मैजिक: ग्राउंड लेवल पर क्या बदला? (The ROI)
एक वक्त का खाना देने से इंडिया की इकॉनमी और सोसाइटी में जो बदलाव आए, वो किसी मैजिक से कम नहीं थे।
1. एनरोलमेंट का धमाका (The Attendance Hack): गरीब पेरेंट्स को समझ आ गया कि अगर वो बच्चे को स्कूल भेजेंगे, तो कम से कम उसके एक टाइम के खाने का खर्च बच जाएगा।
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डेटा: इस स्कीम के लागू होने के कुछ ही सालों के अंदर, प्राइमरी स्कूलों के ड्रॉपआउट रेट्स (Dropout rates) में भारी गिरावट आई। खासकर लड़कियों के एनरोलमेंट (Girls’ Enrollment) में ज़बरदस्त उछाल आया। पेरेंट्स जो पहले सिर्फ लड़कों को स्कूल भेजते थे, अब लड़कियों को भी भेजने लगे क्योंकि स्कूल में ‘फ्री खाना’ मिल रहा था।
2. न्यूट्रिशन और ‘स्टंटिंग’ पर वार: इंडिया की सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी बच्चों का कुपोषण (Malnutrition) और स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से हाइट ना बढ़ना)। ‘Nature’ जैसे टॉप ग्लोबल जर्नल्स की रिसर्च बताती है कि जिन बच्चों को प्राइमरी स्कूल में लगातार मिड-डे मील मिला, उनकी ग्रोथ और न्यूट्रिशन का लेवल उन बच्चों से काफी बेहतर था जिन्हें यह नहीं मिला।
3. कास्ट सिस्टम पर सबसे तगड़ी चोट (Social Equality): ये शायद इस स्कीम का सबसे खूबसूरत और ‘अनप्लान्ड’ (unplanned) साइड-इफेक्ट था। इंडिया के गाँवों में जातिवाद (Caste system) बहुत गहराई तक फैला हुआ था। लेकिन जब मिड-डे मील शुरू हुआ, तो एक ही दरी पर बैठकर ब्राह्मण, दलित, और हर जाति का बच्चा एक साथ खाना खाने लगा। इतना ही नहीं, लाखों स्कूलों में खाना बनाने वाली ‘कुक’ (Cook) दलित या पिछड़ी जाति की महिलाओं को रखा गया। इस स्कीम ने बचपन से ही बच्चों के दिमाग से जाति-पाती का कचरा साफ करने में बहुत बड़ा रोल प्ले किया।
द डार्क साइड: चैलेंजेस और रियलिटी चेक
अब ज़ाहिर सी बात है, जब आप रोज़ 12 करोड़ लोगों को खाना खिलाते हैं, तो सिस्टम 100% परफेक्ट नहीं हो सकता।
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क्वालिटी के इश्यूज़: कई बार न्यूज़ में आता है कि खाने में छिपकली या कीड़े मिल गए, या दूध में पानी मिलाकर बांटा गया। (जैसे बिहार के छपरा का 2013 का वो दर्दनाक हादसा जहाँ खाने में कीटनाशक (Pesticide) होने की वजह से 23 बच्चों की जान चली गई थी)।
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करप्शन: लोकल लेवल पर सरपंच या स्कूल के हेडमास्टर द्वारा राशन की चोरी और करप्शन अभी भी एक बहुत बड़ा चैलेंज है।
हालांकि गवर्नमेंट अब अक्षय पात्र (Akshaya Patra) जैसे बड़े और हाई-टेक NGOs के साथ मिलकर सेंट्रलाइज़्ड मेगा-किचन (Mega-kitchens) बना रही है, जहाँ बिना किसी इंसान के छुए, मशीनों से हर रोज़ लाखों बच्चों का हाइजीनिक खाना बनता है।
द बॉटम लाइन: ये सिर्फ खाना नहीं, देश का फ्यूचर है
मिड-डे मील स्कीम हमें ये सिखाती है कि कभी-कभी देश की सबसे बड़ी प्रॉब्लम्स (जैसे इलिटरेसी और चाइल्ड लेबर) का सलूशन बड़े-बड़े सिलेबस या फैंसी स्मार्ट-क्लासेज में नहीं होता; उसका सलूशन एक प्लेट दाल-चावल में होता है।
आज अगर इंडिया की लिटरेसी रेट 74% के पार गई है और करोड़ों युवा जो आज कॉलेज में हैं या जॉब कर रहे हैं, उनमें से बहुत बड़ा हिस्सा उन बच्चों का है जो शायद स्कूल का दरवाज़ा ही नहीं देखते, अगर उस स्कूल में लंच की घंटी नहीं बजती।