‘शिप-टू-माउथ’ से ग्लोबल ‘अन्नदाता’ तक: कैसे हरित क्रांति ने इंडिया को भुखमरी से बचाया
Tags: The Green Revolution: How India Engineered Its Way Out of Starvation to Food Surplusज़रा इमेजिन कीजिए… आज आप ज़ोमैटो (Zomato) से अपनी फेवरेट थाली ऑर्डर करते हैं, और अगर रोटी थोड़ी सी भी ठंडी या चावल कड़क हो, तो आप तुरंत कंप्लेंट करके रिफंड मांग लेते हैं। आज हमारे घरों में, शादियों में और रेस्टोरेंट्स में जितना खाना रोज़ वेस्ट होता है, वो दुनिया के कई छोटे देशों की टोटल फूड सप्लाई से भी ज़्यादा है।
लेकिन, क्या आप यकीन करेंगे कि आज से कुछ दशक पहले इसी देश के प्राइम मिनिस्टर (लाल बहादुर शास्त्री जी) को नेशनल रेडियो पर आकर देश की जनता से हाथ जोड़कर अपील करनी पड़ी थी कि— “प्लीज़, हफ्ते में एक दिन सोमवार का व्रत (Fast) रखिए, ताकि देश के बाकी लोगों को खाना मिल सके।” सुनकर अजीब लगता है ना? लेकिन 1960 के दशक में इंडिया की सच्चाई यही थी। देश भुखमरी (Starvation) की कगार पर खड़ा था। फिर एंट्री होती है साइंस, गज़ब की पॉलिसी और हमारे किसानों की मेहनत की, जिसने इंडिया की हिस्ट्री का सबसे बड़ा टर्नअराउंड (Turnaround) किया।
चलिए समझते हैं कि कैसे इंडिया ने ‘ग्रीन रेवोल्यूशन’ (Green Revolution) यानी हरित क्रांति के दम पर खुद को एक भिखारी इकॉनमी से दुनिया के सबसे बड़े ‘अन्नदाता’ में बदल दिया।
द डार्क फ्लैशबैक: 1960s का ‘शिप-टू-माउथ’ क्राइसिस
1960 का दशक इंडिया के लिए एक बुरे सपने जैसा था। 1962 में चीन से युद्ध और 1965 में पाकिस्तान से जंग ने देश का खजाना खाली कर दिया था। लेकिन असली तबाही मचाई 1965 और 1966 के भयंकर सूखे (Drought) ने। लगातार दो साल बारिश नहीं हुई और खेतों में फसलें सूख गईं।
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PL-480 का अपमान: हमारे पास अपने लोगों को खिलाने के लिए गेहूं नहीं था। मजबूरी में इंडिया को अमेरिका के सामने हाथ फैलाने पड़े। अमेरिका हमें अपने ‘PL-480’ प्रोग्राम के तहत गेहूं देता था। यह वो सड़ा हुआ लाल गेहूं (Red Wheat) था, जिसे अमेरिका में सूअरों (pigs) को खिलाया जाता था।
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‘शिप-टू-माउथ’ इकॉनमी: हालात इतने नाज़ुक थे कि फॉरेन से पानी का जहाज़ (Ship) इंडिया के पोर्ट पर आता था, और वहीं से अनाज सीधे लोगों के मुंह (Mouth) तक जाता था। अगर जहाज़ आने में एक हफ्ते की भी देरी हो जाती, तो देश में लाखों लोग भूख से मर जाते।
इस अपमान ने गवर्नमेंट को झकझोर कर रख दिया। तत्कालीन एग्रीकल्चर मिनिस्टर सी. सुब्रमण्यम (C. Subramaniam) और एम.एस. स्वामीनाथन (M.S. Swaminathan) जैसे विज़नरी लीडर्स को समझ आ गया था कि हमें किसी भी कीमत पर खेती में ‘साइंस’ को लाना ही पड़ेगा।
द मास्टरमाइंड्स एंड द साइंस: ‘बौने गेहूं’ का मैजिक
इस पूरी प्रॉब्लम का सलूशन एक मेक्सिकन-अमेरिकन साइंटिस्ट डॉ. नॉर्मन बोरलॉग (Norman Borlaug) की लैब में तैयार हो रहा था।
उस वक्त इंडिया में जो गेहूं उगता था, उसके पौधे बहुत लंबे होते थे। जब किसान उन पर खाद (Fertilizer) डालते थे, तो पौधे और लंबे हो जाते थे और हवा चलने पर ज़मीन पर गिरकर टूट जाते थे। इससे दाने (grains) खराब हो जाते थे।
डॉ. बोरलॉग ने मेक्सिको में एक खास तरह का बीज तैयार किया जिसे HYV (High-Yielding Variety) या ‘ड्वार्फ वैरायटी’ (बौना गेहूं) कहा जाता था।
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द साइंस हैक: इन बौने पौधों की खासियत यह थी कि इनकी हाइट छोटी और तना (stem) बहुत मज़बूत होता था। जब इन पर भारी मात्रा में केमिकल फर्टिलाइज़र्स और पानी डाला जाता, तो ये गिरते नहीं थे। सारा न्यूट्रिशन पौधे की हाइट बढ़ाने के बजाय गेहूं के दानों को बड़ा और मोटा करने में लगता था।
डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन इस जादुई बीज (‘कल्याण सोना’ और ‘सोनालिका’ जैसी वैरायटी) को इंडिया लेकर आए।
द एग्जीक्यूशन: 3 पिलर्स जिस पर टिकी हरित क्रांति
सिर्फ अच्छा बीज ले आना काफी नहीं था। इस बीज को बहुत सारा पानी, बहुत सारा केमिकल फर्टिलाइज़र और पेस्टिसाइड (कीटनाशक) चाहिए था। इसलिए गवर्नमेंट ने इस प्रोजेक्ट को पूरे देश में लागू करने के बजाय, सिर्फ उन इलाकों में फोकस किया जहाँ पानी और मेहनती किसान थे— पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western UP)।
इस रेवोल्यूशन को ज़मीन पर उतारने के लिए गवर्नमेंट ने एक पूरा ‘इकोसिस्टम’ बनाया:
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MSP (Minimum Support Price) का जन्म: किसानों को डर था कि अगर नई वैरायटी उगाने में फसल खराब हो गई, तो वो बर्बाद हो जाएंगे। तब 1965 में गवर्नमेंट ने CACP (Commission for Agricultural Costs and Prices) बनाया और ‘MSP’ की गारंटी दी। सरकार ने कहा— “तुम नई टेक्नोलॉजी से गेहूं उगाओ, अगर कोई नहीं खरीदेगा, तो एक फिक्स और मुनाफे वाले रेट (MSP) पर सरकार तुम्हारा एक-एक दाना खरीदेगी।”
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FCI (Food Corporation of India) की एंट्री: सरकार ने जो गेहूं MSP पर खरीदा, उसे स्टोर करने और गरीबों तक राशन की दुकानों (PDS) के ज़रिए पहुँचाने के लिए 1965 में ही FCI की स्थापना की गई।
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सब्सिडी का बूस्टर: किसानों को ट्रैक्टर, ट्यूबवेल लगाने के लिए बिजली, और खाद (Urea) बहुत भारी सब्सिडी पर (या लगभग फ्री) दी गई।
द माइंड-ब्लोइंग ROI: डेटा में देखिए असली रेवोल्यूशन
पंजाब और हरियाणा के किसानों ने इन बीजों और टेक्नोलॉजी को ऐसे अपनाया जैसे कोई जादू हो गया हो। रिज़ल्ट्स इतने भयानक थे कि खुद साइंटिस्ट्स भी शॉक में थे।
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गेहूं का विस्फोट: 1960 के दशक की शुरुआत में इंडिया सिर्फ 10 से 12 मिलियन टन गेहूं पैदा करता था। हरित क्रांति के आते ही, 1970-71 तक यह प्रोडक्शन सीधा जंप मारकर 24 मिलियन टन क्रॉस कर गया।
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रातों-रात स्कूल बन गए गोदाम: पंजाब में अचानक इतना गेहूं पैदा हो गया कि उसे रखने की जगह नहीं बची। सरकार को मजबूरन स्कूलों की छुट्टियों की घोषणा करनी पड़ी ताकि स्कूलों के कमरों में गेहूं की बोरियां रखी जा सकें!
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आज हम कहाँ हैं? जो इंडिया 1965 में अमेरिका के सामने गेहूं की भीख मांग रहा था, वो आज हर साल लगभग 110 मिलियन टन से ज़्यादा गेहूं पैदा करता है। आज इंडिया गेहूं और चावल का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा प्रोड्यूसर है और हम दुनिया के दर्जनों देशों को अपना अनाज एक्सपोर्ट करते हैं।
द डार्क साइड: हर क्रांति की एक कीमत होती है (The Reality Check)
चूंकि हम फैक्ट्स पर बात करते हैं, तो हमें इस रेवोल्यूशन के साइड-इफेक्ट्स को भी समझना होगा। हरित क्रांति ने हमें भुखमरी से तो बचा लिया, लेकिन इसने हमारे पर्यावरण (Environment) की बहुत भारी कीमत वसूली।
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ज़मीन के पानी का खात्मा: HYV बीजों को नॉर्मल बीजों से कई गुना ज़्यादा पानी चाहिए था। फ्री बिजली की वजह से पंजाब और हरियाणा में लाखों ट्यूबवेल लगे, जिन्होंने ज़मीन के अंदर का पानी (Groundwater) इतनी बेरहमी से खींचा कि आज वहाँ पानी का लेवल डेंजर ज़ोन के भी नीचे जा चुका है।
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कैमिकल का ज़हर: ज़्यादा पैदावार के लालच में यूरिया (Urea) और कीटनाशकों (Pesticides) का बेतहाशा इस्तेमाल हुआ। इससे ज़मीन की क्वालिटी तो खराब हुई ही, साथ ही पंजाब के कई इलाकों में कैंसर के केसेस इतने बढ़ गए कि आज वहां से चलने वाली एक ट्रेन का नाम ही ‘कैंसर ट्रेन’ (Cancer Train) पड़ गया है।
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मोनोकल्चर (Monoculture): एमएसपी सिर्फ गेहूं और चावल पर मिलती थी, इसलिए किसानों ने दालें, बाजरा और बाकी पौष्टिक अनाज उगाना लगभग बंद कर दिया।
स्टूडेंट्स और फ्यूचर लीडर्स के लिए लेसन
ग्रीन रेवोल्यूशन हमें सिखाता है कि अगर गवर्नमेंट की पॉलिसी, साइंटिफिक इनोवेशन और आम आदमी (किसान) की मेहनत एक ही डायरेक्शन में काम करे, तो देश के सबसे बड़े क्राइसिस को भी परमानेंटली सॉल्व किया जा सकता है।
लेकिन यह हमें एक और बड़ी वार्निंग देता है—कोई भी टेक्नोलॉजी या शॉर्ट-टर्म सलूशन परफेक्ट नहीं होता। आज के टाइम में हमारी जनरेशन के सामने सबसे बड़ा चैलेंज यही है कि हमें एक नया रेवोल्यूशन चाहिए: ‘Evergreen Revolution’ (सदाबहार क्रांति), जहाँ पैदावार तो ज़्यादा हो, लेकिन ज़मीन, पानी और इंसान की सेहत को नुकसान पहुँचाए बिना (Organic और Sustainable Farming के ज़रिए)।