द ग्रेट इंडियन हाईवे: जब ‘गोल्डन क्वाड्रीलेटरल’ ने इंडिया की इकॉनमी को टॉप गियर में डाल दिया

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The Golden Quadrilateral: The Highway Masterplan That Connected the Corners of India

ज़रा इमेजिन कीजिए… आपको दिल्ली से मुंबई बाय रोड एक ज़रूरी सामान भेजना है। आज के टाइम में आप एक ट्रांसपोर्टर को कॉल करते हैं, एक भारी-भरकम 18-पहिया ट्रक लोड होता है, और एक्सप्रेसवे के रास्ते मक्खन की तरह चलते हुए वो 24 से 48 घंटे में मुंबई पहुँच जाता है। रास्ते में आप अपने फोन पर GPS से उसकी लाइव लोकेशन भी ट्रैक कर लेते हैं।

लेकिन, 1990 के दशक के इंडिया में वापस चलिए। यही दिल्ली से मुंबई का सफर किसी बुरे सपने से कम नहीं था। देश के ‘नेशनल हाईवे’ नाम के तो हाईवे थे, लेकिन असल में वो सिंगल-लेन या डबल-लेन की टूटी-फूटी सड़कें थीं।

ट्रक ड्राइवर्स को गड्ढों से बचकर गाड़ी निकालनी पड़ती थी, रेलवे क्रॉसिंग पर घंटों जाम में फँसना पड़ता था, और एक शहर से दूसरे शहर सामान पहुँचाने में हफ़्तों लग जाते थे। इस स्लो स्पीड की वजह से किसानों की आधी से ज़्यादा सब्ज़ियां और फल रास्ते में ही सड़ जाते थे। विदेशी कंपनियां इंडिया में फैक्ट्री लगाने से डरती थीं क्योंकि यहाँ ‘लॉजिस्टिक्स’ (Logistics) का सिस्टम पूरी तरह कोलैप्स था।

गवर्नमेंट को एक बात बहुत क्लियरली समझ आ गई थी— “अगर इंडिया की इकॉनमी की नसों में खून दौड़ाना है, तो सबसे पहले देश की सड़कों का बायपास (Bypass) सर्जरी करना होगा।”

यहीं से शुरुआत हुई आज़ाद भारत के सबसे बड़े और सबसे एम्बिशियस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट की— गोल्डन क्वाड्रीलेटरल (Golden Quadrilateral) यानी स्वर्णिम चतुर्भुज।

चलिए, बिना किसी देरी के इस पूरे मेगा-प्रोजेक्ट का एक डेटा-ड्रिवन पोस्टमॉर्टम करते हैं और समझते हैं कि कैसे 5,846 किलोमीटर लंबी एक सड़क ने इंडिया के बिज़नेस, ट्रांसपोर्ट और फ्यूचर का पूरा नक्शा बदल कर रख दिया।

द विज़न: 4 कोनों को जोड़ने का ‘मास्टरप्लान’

साल 1998, देश के प्राइम मिनिस्टर थे अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee)। उनका विज़न एकदम क्लियर था—अमेरिका इसलिए अमीर नहीं है क्योंकि वहां की सड़कें अच्छी हैं, बल्कि अमेरिका की सड़कें अच्छी हैं इसलिए वो अमीर है।

वाजपेयी जी ने एक मैप पर इंडिया के चार सबसे बड़े महानगरों (Metros) पर चार बिंदु बनाए:

  1. नॉर्थ में दिल्ली (Delhi)

  2. साउथ में चेन्नई (Chennai)

  3. ईस्ट में कोलकाता (Kolkata)

  4. वेस्ट में मुंबई (Mumbai)

जब इन चारों बिंदुओं को लाइनों से जोड़ा गया, तो एक चतुर्भुज (Quadrilateral) का शेप बना। प्लान यह था कि इन चारों महानगरों को आपस में 4-लेन और 6-लेन के वर्ल्ड-क्लास हाईवेज़ से जोड़ दिया जाए।

यह कोई छोटा-मोटा रोड प्रोजेक्ट नहीं था। इसकी टोटल लंबाई थी 5,846 किलोमीटर। यह दुनिया का 5वां सबसे लंबा हाईवे प्रोजेक्ट था, जिसमें देश के 13 बड़े राज्यों से होकर गुज़रना था।

द फाइनेंस हैक: 60,000 करोड़ रुपये कहाँ से आएंगे?

प्लान तो बहुत शानदार था, लेकिन सबसे बड़ी प्रॉब्लम थी ‘पैसा’। 1990s के आखिर में इंडिया कोई बहुत अमीर देश नहीं था। इस प्रोजेक्ट का एस्टिमेटेड बजट लगभग ₹58,000 से ₹60,000 करोड़ था। अगर गवर्नमेंट वर्ल्ड बैंक (World Bank) या IMF से इतना बड़ा लोन लेती, तो देश कर्ज़े के जाल में फँस जाता।

यहीं पर इंडियन गवर्नमेंट ने फाइनेंस का एक बहुत ही ब्रिलियंट और साइलेंट ‘हैक’ (Hack) यूज़ किया— द पेट्रोल एंड डीज़ल सेस (The Cess Model)

सरकार ने डिसाइड किया कि हम इस प्रोजेक्ट को देश के लोगों के पैसे से ही बनाएंगे, लेकिन इस तरह कि किसी को भारी भी न लगे। सरकार ने पेट्रोल और डीज़ल पर सिर्फ 1 रुपये प्रति लीटर का ‘सेस’ (टैक्स) लगा दिया।

  • जो भी इंसान अपनी बाइक या कार में तेल भरवाता, उसका 1 रुपया सीधा ‘Central Road Fund’ (CRF) में चला जाता।

  • 1 रुपये का एक्स्ट्रा चार्ज पब्लिक को ज़्यादा नहीं लगा, लेकिन जब देश के करोड़ों वाहनों ने हर रोज़ तेल भरवाया, तो सरकार के पास रोज़ाना करोड़ों रुपये का फंड जमा होने लगा।

इसी फंड के दम पर ‘National Highways Authority of India’ (NHAI) ने इस मेगा-प्रोजेक्ट को 2001 में ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया।

द एग्जीक्यूशन एंड द डार्क साइड (सत्येंद्र दुबे का बलिदान)

5,846 किलोमीटर की सड़क बनाना कोई ऐसा काम नहीं था जो बिना खून-पसीने के हो जाए। ज़मीन अधिग्रहण (Land Acquisition) से लेकर जंगलों की परमिशन तक, हज़ारों मुश्किलें थीं। लेकिन सबसे बड़ी प्रॉब्लम था— ‘हाइवे माफिया’ और करप्शन।

जब इतने हज़ारों करोड़ के टेंडर (Tenders) निकलते थे, तो लोकल बाहुबली और करप्ट ठेकेदार घटिया मटीरियल लगाकर पैसे खाना चाहते थे।

इस प्रोजेक्ट की हिस्ट्री में एक बहुत ही दर्दनाक लेकिन इंस्पायरिंग चैप्टर है सत्येंद्र दुबे (Satyendra Dubey) का। सत्येंद्र दुबे IIT कानपुर से पढ़े एक बेहद ईमानदार इंजीनियर थे, जो NHAI के लिए काम कर रहे थे। उन्होंने बिहार के कोडरमा सेक्टर में चल रहे भयंकर करप्शन और माफिया के खेल को पकड़ लिया। उन्होंने ठेकेदारों को ब्लॉक कर दिया और सीधा प्राइम मिनिस्टर ऑफिस (PMO) को चिट्ठी लिखकर इस फ्रॉड की जानकारी दी।

लेकिन सिस्टम में बैठे भ्रष्ट लोगों ने उनका नाम लीक कर दिया, और 2003 में सत्येंद्र दुबे की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस मर्डर ने पूरे देश को हिला कर रख दिया। हालांकि इससे प्रोजेक्ट रुका नहीं, बल्कि पब्लिक और मीडिया के प्रेशर में सरकार को और भी ज़्यादा ट्रांसपेरेंसी (Transparency) लानी पड़ी। सत्येंद्र दुबे का बलिदान इस बात का सुबूत है कि इस हाईवे की नींव में सिर्फ कंक्रीट नहीं, बल्कि एक सच्चे इंडियन का खून भी शामिल है।

द ROI (Return on Investment): इकॉनमी का ‘बूम’ (The Hard Data)

2012 तक आते-आते (कुछ डिलेज़ के बाद) गोल्डन क्वाड्रीलेटरल का काम लगभग पूरी तरह कंप्लीट हो गया। अब सवाल ये है कि क्या उन 60 हज़ार करोड़ रुपयों ने अपना काम किया? आइए ग्राउंड का रियल डेटा देखते हैं:

1. द टाइम एंड फ्यूल सेविंग (लॉजिस्टिक्स का जादू):

  • ट्रैवल टाइम में 50% की कमी: जो ट्रक पहले दिल्ली से मुंबई जाने में 5-6 दिन लगाते थे, वो अब 2 से 3 दिन में पहुँचने लगे।

  • वर्ल्ड बैंक की एक डिटेल स्टडी के मुताबिक, इस हाईवे के बनने से ट्रांसपोर्टर्स के फ्यूल (डीज़ल) और गाड़ियों के मेंटेनेंस के खर्च में भारी कमी आई। इंडिया को हर साल सिर्फ ‘फ्यूल सेविंग’ और ‘टाइम सेविंग’ से ही हज़ारों करोड़ रुपये का इकॉनोमिक फायदा होने लगा।

2. द इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स (फैक्ट्रियों की बाढ़): हाइवे सिर्फ गाड़ियां चलाने के लिए नहीं होते, वो इकॉनमी के ‘मैग्नेट’ (Magnet) होते हैं।

  • जैसे-जैसे हाईवे बनता गया, उसके किनारे-किनारे नई फैक्ट्रियां और इंडस्ट्रियल हब्स (Industrial Hubs) खुलने लगे।

  • पुणे (Pune), मानेसर-गुरुग्राम (NCR), और चेन्नई का श्रीपेरंबदूर (Sriperumbudur) ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के सबसे बड़े हब बन गए, क्योंकि अब वहाँ से कारें बनाकर ट्रकों के ज़रिए सीधे बंदरगाहों (Ports) और बड़े शहरों तक बहुत आसानी से पहुँचाई जा सकती थीं।

3. रूरल इकॉनमी (किसानों का फायदा):

  • जो छोटे शहर और गांव इस हाईवे के 10-20 किलोमीटर के रेडियस में आते थे, वहाँ की ज़मीनों के रेट्स आसमान छूने लगे।

  • किसानों के लिए अपनी ताज़ा सब्ज़ियां, दूध और अनाज बिना सड़े पास के बड़े महानगरों की मंडियों तक पहुँचाना पॉसिबल हो गया। इससे खेती की वेस्टेज (Wastage) में भारी कमी आई और किसानों की इनकम बढ़ी।

4. जॉब क्रिएशन:

  • इस पूरे 10-12 साल के कंस्ट्रक्शन पीरियड में, सीमेंट और स्टील इंडस्ट्री को इतना बड़ा बूम मिला जो पहले कभी नहीं मिला था। लाखों मज़दूरों, इंजीनियर्स और कॉन्ट्रैक्टर्स को सीधे तौर पर रोज़गार मिला।

द बॉटम लाइन: 21वीं सदी के इंडिया का फाउंडेशन

गोल्डन क्वाड्रीलेटरल कोई आम सड़क नहीं थी; यह 21वीं सदी के ‘न्यू इंडिया’ (New India) का फाउंडेशन था। आज हम जो दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे, पूर्वांचल एक्सप्रेसवे या समृद्धि महामार्ग (Samruddhi Mahamarg) जैसे सुपर-एडवांस 8-लेन वाले ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवेज़ देख रहे हैं, वो सब इसी स्वर्णिम चतुर्भुज की सक्सेस के बाद पैदा हुए हैं।

इस प्रोजेक्ट ने इंडियन गवर्नमेंट और ब्यूरोक्रेसी को ये कॉन्फिडेंस (Confidence) दिया कि— “हाँ, हम भी चीन और अमेरिका के लेवल के मेगा-प्रोजेक्ट्स को इंडिया में प्लान कर सकते हैं और उन्हें सक्सेसफुली ज़मीन पर उतार सकते हैं।”

आज जब आप किसी भी 4-लेन या 6-लेन हाईवे पर 100 किमी/घंटा की स्पीड से क्रूज़ कंट्रोल (Cruise Control) लगाकर अपनी गाड़ी चलाते हैं, तो वो सिर्फ एक स्मूथ राइड नहीं है; वो उस विज़न और मेहनत का नतीजा है जिसने इंडिया की इकॉनमी के चारों कोनों को एक मज़बूत धागे में पिरो दिया था।

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